उपभोग और विलासता का साधन नहीं है : – प्रकृति- ताराचंद साहू
ताराचंद साहू की कलम से,,,
आज के वर्तमान समय में प्रकृति का दोहन जिस प्रकार से किया जा रहा है वह दिन दूर नहीं कि हमें इसका ऐसी बुरी कीमत चुकाना ना पड़े कि आने वाले समय में मानव जाति के विनाश का कारण ना बन जाए। प्रकृति और हमारे जीवन में एक अनगिनत कृतज्ञाएं मांगती है लेकिन हम इस पवित्र रिश्ते को सही ढंग से नहीं निभा रहे हैं। प्रकृति ने हमें सांसों से लेकर भोजन पानी सब कुछ दिया लेकिन हम उसके बदले में हवाओं में प्रदूषण, नदियों में बढ़ते कचरे ,जंगलो का कटाव कर उसे खोखला बनाते हैं चले जा रहे हैं।
अभी हाल ही में 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया। जिसमें हमारे पर्यावरण संरक्षण व जल संवर्धन के महत्व के बारे में जन जागरूकता बढ़ाने के लिए कार्यक्रम किया गया है। विश्व पर्यावरण दिवस की शुरुआत वर्ष 1972 में मानव पर्यावरण सम्मेलन के दौरान हुआ था, 5 जून 1974 को केवल एक पृथ्वी थीम के साथ यह दिवस मनाया गया। जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने भाग लिया था , इस विषय पर विचार करते हुए 19 नवंबर 1986 को पर्यावरण संरक्षण अधिनियम लागू किया गया , साथ ही 1987 में हर वर्ष पर्यावरण दिवस की मेजबानी करने के लिए अलग-अलग राष्ट्रों का चुनाव किया गया है। वर्ष 2025 में इस बार कोरिया गणराज्य ने इसकी मेजबानी किया।
पर्यावरण और पारिस्थितिक तंत्र के पुनर्निर्माण विषय के साथ वर्ष 2021 से 2030 तक संयुक्त राष्ट्र दशक की घोषणा की गई है। इसका मूल उद्देश्य है कि जो पर्यावरण को छति पहुंचाई गई है उसकी भरपाई किया जाना। इन दिनों जिस प्रकार से गर्मी और तापमान बढ़ता जा रहा है उसे देख पर्यावरण दिवस का महत्व भी लोगों को अब समझ में आने लगा है। वर्ष 2024 दिल्ली में 29 मई को अधिकतम तापमान 52.9 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, इसके पहले राजस्थान में वर्ष 2016 में 51 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था जो देश में अब तक का सबसे अधिकतम तापमान रिकॉर्ड किया गया।
इस बार पर्यावरण दिवस 2025 की थीम प्लास्टिक प्रदूषण को समाप्त करना रखा गया था। इसमें कोरिया गणराज्य वैश्विक समारोह की मेजबानी किया। दशकों से प्लास्टिक प्रदूषण विश्व के हर कोने में फैल चुकी है। जिसको समाप्त करना एक बहुत बड़ी चुनौती साबित हो रही है। वर्ष 2024 में पर्यावरण दिवस की थीम भूमि पुनर्स्थापना मरुस्थली और सुख लचीलापन रहा था। मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र कनवेंशन में दुनिया के 40% भूमि वर्तमान में क्षरण के दायरे में है जो सीधे तौर पर दुनिया के आधे आबादी को प्रभावित कर रही है साथ ही दुनिया के लगभग 50% आर्थिक उत्पादन को खतरा पहुंच रही है। जो 44 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के बराबर है। वर्ष 2000 में सुख की आवृत्ति 29% थी जो अगर इस तरह बढ़ते रहा तो 2050 में सुखा वैश्विक विश्व के आबादी के तीन चौथाई से अधिक लोगों आजीविका को खत्म खतरे में डाल सकता हैं।
मानव ने हमेशा अपने विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया है साथ ही विश्व के सभी देश अपनी आर्थिक प्रगति के लिए प्राकृतिक संसाधनों का वहन करते आ रहे हैं। जिसका परिणाम है कि प्रदूषण का स्तर काफी तेजी से बढ़ता जा रहा है। हमें अपनी सुख सुविधा के लिए अधिकाधिक पेट्रोलियम पदार्थों का उपयोग करते हैं । घरों में वातानुकूलित के लिए AC का उपयोग करते हैं।कारखाने से निकलने वाले जैविक पदार्थ को सुविधा के अनुसार कहीं भी छोड़ देते हैं। एक सर्वे के अनुसार भारत में प्रदूषण उत्सर्जन प्रतिदिन कितने टन निकलता है उसका मानक बताया है जो की हवा में सूक्ष्म कण 60 टन प्रतिदिन, सल्फर डाइऑक्साइड 630 , नाइट्रोजन ऑक्साइड 270 , कार्बन मोनोऑक्साइड 2040 टन प्रतिदिन के हिसाब से उत्सर्जन होता है हमारे जो कि हमारे पर्यावरण को दूषित करते हैं।
भारत ने पर्यावरण प्रदूषण संरक्षण के लिए साल 2021 में बेहतर पर्यावरण के लिए जैविक ईंधन को बढ़ावा दिया गया । इसके लिए भारत सरकार ने देश में एथेनॉल के उत्पादन और वितरण के लिए E100 नामक प्रमुख योजना की शुरुआत किया गया। सरकार ने E20 अधिसूचना जारी कर तेल कंपनियों को अप्रैल 2023 से 20% एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल तथा एथेनॉल मिश्रण E12 व E15 को BIS के आधार पर बेचने की अनुमति प्रदान की है।
हाल ही में छत्तीसगढ़ के हसदेव अरंड जंगल में पेड़ों की कटाई रोकने के लिए वहां की स्थानीय जनजाति निवासियों ने सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। यह जंगल 170000 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है। हसदेव अरंड जंगल में गोंड , उरांव और अन्य जनजाति के 10000 लोग निवास करते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार यह अनुमान लगाया गया कि स्थानीय समुदाय का वार्षिक आय का लगभग 60 से 70% हिस्सा वन संसाधनों पर आधारित है। इस जंगल में 82 प्रजाति पक्षियों, 167 वनस्पति तथा यह जंगल हाथियों के निवास का प्रमुख स्थान है। इस क्षेत्र में कोयला के 1879.6 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है जिसमें 1.369 बिलियन टन कोयला व 5.179 बिलियन टन भंडार क्षेत्र है। जिसके वनों की कटाई से पर्यावरण को खासा नुकसान पहुंचेगा हैं। वही स्थानी निवासियों को आर्थिक संकटों का सामना करना पड़ सकता है।
आज वर्तमान समय में हम सबको तथा सरकार को यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि हम अपने पर्यावरण के लिए क्या कर सकते हैं।यह दायित्व भारत व विश्व के प्रत्येक नागरिकों की जवाबदेही बनती है हम अपने आने वाले पीढी को जो जीवन देने वाले को किस प्रकार के दे रहे हैं।एक और प्रगति देखते हैं तो दूसरी ओर उसका विनाश भी देख रहे हैं। पर्यावरण संरक्षण को बचाने के लिए वर्ष के जल को संचय करना, जैविक खाद का उपयोग करना ,पेड़ पौधे लगाना, प्लास्टिक उपयोग न करना ,कार्बन का मात्रा वायुमंडल काम करना, जल का समुचित उपयोग करना, रीसायकल रीडूज और रियूज सिद्धांत का पालन करना चाहिए,,
ताराचंद साहू की क़लम से,,,,,

Author: Deepak Mittal
