
आलेख डॉ. नीलकमल गर्ग सीनियर एडवोकेट हाईकोर्ट
बिलासपुर: आरटीआई अधिनियम, जिसे 2005 में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए लागू किया गया था, अब खुद ही भ्रष्टाचार के चंगुल में फंसा हुआ दिख रहा है। आरटीआई के तहत जानकारी मांगने पर कई अधिकारी जानबूझकर टालमटोल कर रहे हैं।
देशभर में आरटीआई के प्रति प्रशासन की लापरवाही और नियमों का दुरुपयोग स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। सूत्रों के अनुसार, जिला पंचायत बिलासपुर, महाधिवक्ता कार्यालय, और नगर निगम बिलासपुर सहित कई विभाग वर्षों से जानकारियाँ देने में असमर्थ रहे हैं।
संवेदनहीन अधिकारी और सूचना देने में ढील:
एक आरटीआई आवेदक ने बताया कि, “महाधिवक्ता कार्यालय में नियमों का उल्लंघन करते हुए फर्जी नियुक्तियों की जानकारी पिछले 6-7 सालों से नहीं दी गई है। जिला पंचायत में भी नियुक्तियों से जुड़ी जानकारी देने में विभाग नाकाम रहा है।”
आरटीआई अधिनियम के कुछ प्रावधान जैसे धारा 8 और 9 का गलत इस्तेमाल कर, अधिकारियों द्वारा जानकारियों को छुपाने के मामले सामने आ रहे हैं। कई बार आवेदकों को लंबा इंतजार कराया जाता है, लेकिन फिर भी सही जानकारी नहीं मिलती।
प्रशासनिक उदासीनता और सूचना आयोग की कमजोरी:
आरटीआई से जुड़े कई आवेदन पहले अपील अधिकारी के पास लंबित रहते हैं, और कुछ मामले वर्षों तक सूचना आयोग में पेंडिंग पड़े रहते हैं। कोषालय अधिकारी, जिला शिक्षा अधिकारी, और कृषि विभाग के उच्च अधिकारी तक जानकारियां नहीं देते, जिससे इस अधिनियम का मूल उद्देश्य ही खतरे में पड़ गया है।
आरटीआई कानून की स्थिति पर सवाल:
यह स्थिति केवल बिलासपुर तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में आरटीआई का यह हाल हो चुका है। पुलिस, शिक्षा, और स्वास्थ्य विभाग जैसे महत्वपूर्ण विभाग भी सूचना देने से मना करते हैं। अधिकारी जवाबदेही से बचने के लिए बहाने बनाते हैं, जिससे आम जनता के लिए पारदर्शिता मात्र एक सपना बनकर रह जाती है।
कानून विशेषज्ञों की मांग:
कानून विशेषज्ञों का कहना है कि आरटीआई अधिनियम के साथ अन्य कानूनों की तरह इसमें भी सुधार की आवश्यकता है। सरकार के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वह कानून का सही तरीके से क्रियान्वयन सुनिश्चित करे। विशेषज्ञों का सुझाव है कि सरकार आरटीआई को सशक्त बनाने और भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए सख्त कदम उठाए।
अधिकारियों पर कार्रवाई का सवाल:
आम नागरिक और कानूनविद इस स्थिति पर सवाल उठा रहे हैं कि यदि आरटीआई के तहत सरकार की ही एजेंसियां जानकारी देने से इनकार करें, तो इस अधिनियम का उद्देश्य कैसे पूरा होगा।

Author: Deepak Mittal
