ब्यास नदी के उफान में कुत्ता फरिश्ता बनकर आया, टापू पर फंसी थीं 30 गायें, कुत्ते की भौंक से बची जान

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हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में हाल ही में ऐसी घटना सामने आई जिसने न सिर्फ इंसानियत को नई ऊंचाई दी, बल्कि यह भी दिखाया कि कभी-कभी बेजुबान जानवर भी फरिश्ता बन सकते हैं।

पोंग डैम से छोड़े गए पानी के कारण जब ब्यास नदी उफान पर आई, तो नदी के बीच बने एक छोटे से टापू पर करीब 30 गायें कई दिनों तक भूखी-प्यासी फंसी रहीं। गांव वालों को इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी, जब तक कि एक आम सा दिखने वाला कुत्ता उनकी राह रोके नहीं खड़ा हो गया। उसी की लगातार भौंक और जिद ने लोगों का ध्यान खींचा और फिर जो हुआ, वो मानवता और जानवरों के बीच अनकहे रिश्ते की एक खूबसूरत मिसाल बन गया।

ब्यास नदी में फंसी थीं 30 गायें

पोंग डैम से छोड़े गए भारी पानी के कारण ब्यास नदी में अचानक जलस्तर बहुत बढ़ गया। नदी का पानी इतना तेज हो गया कि उसके बीच एक छोटा-सा टापू बन गया। इस टापू पर गांव की करीब 25 से 30 गायें भूखी-प्यासी और लाचार खड़ी थीं। कई दिनों से ये गायें वहीं फंसी थीं, लेकिन गांववालों को इसकी खबर तक नहीं थी।

एक आम कुत्ता बना हीरो

एक शाम रियाली गांव में रहने वाले रमेश कालिया के घर के पास एक कुत्ता बार-बार आकर जोर-जोर से भौंक रहा था। वो बहुत बेचैन था, जैसे किसी को कुछ बताना चाहता हो। रमेश ने बताया कि वो उसे कई बार भगाने की कोशिश करते रहे, लेकिन कुत्ता टस से मस नहीं हुआ। उसकी आंखों में एक अजीब चमक थी, सांसें तेज थीं, और वह लगातार एक ही दिशा में दौड़ता और फिर पीछे मुड़कर देखता, जैसे कह रहा हो – “चलो मेरे साथ।”

कुत्ता 900 मीटर तक दिखाता रहा रास्ता

आखिर रमेश और कुछ ग्रामीण उस कुत्ते के पीछे चल पड़े। करीब 900 मीटर तक वह उन्हें रास्ता दिखाता रहा। फिर अचानक वह रुक गया। जब लोगों ने सामने देखा, तो सब हैरान रह गए ब्यास नदी के बीचों-बीच एक छोटे से टापू पर ढेर सारी गायें खड़ी थीं। चारों तरफ बहता गुस्सैल पानी और बीच में फंसी ये बेजुबान जानें।

गांववालों ने जुटाया 24 क्विंटल चारा

जैसे ही गांव में खबर फैली, लोग तुरंत मदद के लिए आगे आए। किसी ने पेड़ की टहनियां काटीं, किसी ने हरे पत्ते तोड़े। मिलकर करीब 24 क्विंटल चारा इकट्ठा कर लिया गया ताकि गायों को भूख से राहत मिल सके।

गायों को ऐसे बचाया गया

अब असली चुनौती थी – इस गहरी और तेज बहती नदी को पार कैसे किया जाए? तभी रिटायर्ड फौजी नूर मोहम्मद और संजीव अली सामने आए। दोनों ने एक किश्ती (नाव) में चारा भरा और बर्फ जैसे ठंडे और खतरनाक पानी से होते हुए उस टापू तक पहुंच गए। जब उन्होंने वहां चारा डाला, तो भूखी गायें उस पर टूट पड़ीं।

तैराकों ने बनाई इंसानियत की चेन

रात होते-होते गांववालों की चिंता और बढ़ गई। अगली सुबह रमेश ने तहसीलदार से मदद मांगी। पास के गांव से माहिर तैराक बुलाए गए। उस समय नदी की ऊंचाई 16 से 18 फीट तक थी, लेकिन तैराकों ने रस्सियों से एक चैन बनाई और एक-एक करके सारी गायों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया।

कुत्ता, जो चुपचाप चला गया

जिस कुत्ते ने सबसे पहले इस संकट की ओर ध्यान दिलाया था, वह गायों के रेस्क्यू के बाद चुपचाप कहीं चला गया। रमेश ने बताया कि वह तीन दिनों से उस कुत्ते को ढूंढ रहे हैं, लेकिन वह कहीं दिखाई नहीं दिया। वह कुत्ता गांव के लिए सिर्फ एक जानवर नहीं, एक हीरो बन गया है।

इस घटना ने साबित कर दिया कि इंसानियत अभी भी जिंदा है चाहे वो एक आम इंसान हो, रिटायर्ड फौजी, तैराक या फिर एक वफादार कुत्ता। सभी ने मिलकर बेजुबानों की जान बचाई। हिमाचल की इस घटना ने सिखाया कि जब हम मिलकर काम करते हैं, तो बड़ी से बड़ी मुश्किल आसान हो जाती है।

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Author: Deepak Mittal

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