नई दिल्ली: यूजीसी (UGC) के नए नियमों को लेकर देशभर में विरोध, सामाजिक आक्रोश और सुप्रीम कोर्ट से रोक लगने के बाद भारतीय जनता पार्टी (BJP) बैकफुट पर नजर आ रही है। विवाद बढ़ने और अपने नेताओं के बयानों से असहज हुई पार्टी ने अब अपने ही ‘बयानवीरों’ पर लगाम कस दी है। बीजेपी ने सभी केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों को यूजीसी और उससे जुड़े किसी भी मुद्दे पर कोई भी सार्वजनिक टिप्पणी न करने का निर्देश दिया है।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी संसदीय दल की ओर से यह साफ निर्देश जारी किया गया है कि सभी नेता इस आदेश का कड़ाई से पालन करें। दरअसल, राजनीतिक रूप से संवेदनशील इस मुद्दे पर पहले ही नेताओं को चुप रहने को कहा गया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कुछ मंत्रियों और सांसदों ने बयानबाजी कर दी, जिससे पार्टी की मुश्किलें और बढ़ गईं।
इसी के बाद गुरुवार को हुई बीजेपी प्रवक्ताओं की बैठक में भी स्पष्ट कर दिया गया कि यूजीसी विवाद पर न तो बयान देना है और न ही किसी टीवी डिबेट में हिस्सा लेना है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि इस मुद्दे पर बयानबाजी से सरकार की और किरकिरी हो सकती है।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए नियमों पर रोक लगाते हुए केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी किया है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने नियमों की भाषा को अस्पष्ट बताया और कहा कि इसका गलत इस्तेमाल संभव है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोर्ट दखल नहीं देता, तो इसके खतरनाक परिणाम हो सकते हैं और स्थिति का फायदा उठाया जा सकता है। फिलहाल कोर्ट ने कहा है कि यूजीसी के 2012 के नियम ही लागू रहेंगे।
सामान्य वर्ग में था जबरदस्त आक्रोश
यूजीसी के नए नियमों को लेकर खासकर सामान्य वर्ग में जबरदस्त नाराजगी देखने को मिली थी। सरकार की सफाइयों के बावजूद विरोध थम नहीं रहा था। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट के फैसले को एक वर्ग अपनी जीत मान रहा है, जबकि दूसरा इसे सरकार के लिए बड़ा झटका बता रहा है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ जीत-हार का मामला नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां कहीं ज्यादा गंभीर और दूरगामी असर वाली हैं।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कई अहम और सख्त टिप्पणियां कीं—
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अगर कोर्ट दखल नहीं देगा तो इसके खतरनाक परिणाम होंगे और समाज में विभाजन बढ़ेगा।
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भारत में अमेरिका जैसे हालात नहीं बनने चाहिए, जहां कभी अश्वेत और श्वेत अलग-अलग स्कूलों में पढ़ते थे।
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भारत की एकता और विविधता शिक्षण संस्थानों में दिखनी चाहिए।
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स्कूल और कॉलेजों को अलग-थलग नहीं रखा जा सकता, कैंपस का माहौल समाज को प्रभावित करता है।
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संविधान राज्यों को SC-ST के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है, लेकिन भेदभाव की इजाजत नहीं देता।
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यूजीसी के जाति से जुड़े नियम अस्पष्ट हैं और इनके दुरुपयोग की आशंका है, इन्हें स्पष्ट करने के लिए विशेषज्ञों की जरूरत है।
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75 साल बाद जाति-विहीन समाज की दिशा में जो हासिल किया गया है, क्या हम उल्टी दिशा में जा रहे हैं?
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समाज को जाति-विहीन बनाने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए, लेकिन जरूरतमंदों की सुरक्षा भी सुनिश्चित होनी चाहिए।
यूजीसी विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की इन कड़ी टिप्पणियों के बाद बीजेपी फिलहाल बेहद सतर्क रुख अपनाए हुए है और यही वजह है कि पार्टी ने अपने नेताओं को इस मुद्दे पर पूरी तरह चुप्पी साधने का आदेश दिया है।
Author: Deepak Mittal









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