भारत में लगभग हर मंदिर में वीआईपी दर्शन की लाइन अलग होती है। कुछ पैसे देने के बाद आप लंबी लाइनों से बचकर सीधे भगवान के दर्शन के लिए पहुंच सकते हैं। हालांकि, कई बार इस पर सवाल भी उठते रहे हैं। ऐसा ही एक मामला, मद्रास हाई कोर्ट भी पहुंचा।
मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट में मंदिरों में पैसे के आधार पर दी जाने वाली विशेष सुविधा पर चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने कहा कि भगवान के सामने मंत्री या आम आदमी में कोई भेद नहीं है। उनके सामने सभी बराबर हैं। ऐसे में वीआईपी दर्शन का कोई औचित्य नहीं है।
जस्टिस जी आर स्वामीनाथन और जस्टिस लक्ष्मीनारायणन की बेंच ने मंदिरों में वीआईपी दर्शन के मामले की सुनवाई के दौरान तीखे सवाल उठाए। मंदिरों में वीआईपी दर्शन की प्रथा पर सवाल उठाते हुए हाई कोर्ट ने पूछा कि क्या भगवान के सामने मंत्री और एक आम जन में फर्क है? कोर्ट ने कहा कि कोई भी प्रक्रिया है, इससे आम जनता को परेशानी नहीं होनी चाहिए।
कोर्ट ने कहा, “मंत्रियों और विधायकों को यह नहीं सोचना चाहिए कि मंदिर में भगवान उनका इंतजार कर रहे हैं, और वह किसी भी समय मंदिर जा सकते हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए। आखिर हमें वीआईपी दर्शन की क्या आवश्यकता है? ईश्वर के समक्ष को सभी लोग समान हैं। उसमें फिर क्या मंत्री और क्या आम जनता।”
कोर्ट के इस सवाल पर एडिशनल सॉलिसिटर जनरल पी वी बालासुब्रमण्यम ने सरकार का पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि इस तरह की प्रथा का पालन करने से लंबी-लंबी कतारों से मुक्ति मिलती है, दूसरी तरफ इससे मंदिरों को भी काफी आय होती है। अपनी इस दलील के साथ ही उन्होंने पूरा जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा। हाईकोर्ट ने उनकी याचिका को स्वीकार करते हुए छह सप्ताह का समय दिया है।
Author: Deepak Mittal










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