नई दिल्ली: आयुर्वेद में शरीर को स्वस्थ और संतुलित बनाए रखने के लिए तीन दोषों—वात, पित्त और कफ—का संतुलन बेहद जरूरी माना गया है। ये दोष शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। इनमें से वात दोष का संबंध वायु और आकाश तत्व से होता है, जो शरीर में ऊर्जा, गति और संचार के लिए जिम्मेदार है। जब वात दोष असंतुलित हो जाता है, तो त्वचा में रूखापन, बालों का झड़ना, अनिद्रा, जोड़ों में दर्द और तंत्रिका संबंधी समस्याएं होने लगती हैं। आयुर्वेद में वात दोष को संतुलित करने के लिए कई सरल और प्रभावी उपाय बताए गए हैं।
1. स्नेहपान (तेल का सेवन)
बढ़े हुए वात को शांत करने के लिए तिल के तेल का सेवन लाभकारी माना गया है। तिल का तेल तासीर में गर्म होता है और वात को संतुलित करने में मदद करता है। इसे भोजन में मिलाकर सेवन किया जा सकता है।
2. अभ्यंग (तेल मालिश)
वात का सीधा संबंध रूखापन से है। शरीर में वात बढ़ने पर त्वचा और बाल रूखे हो जाते हैं। ऐसे में नियमित रूप से तेल से मालिश करने से त्वचा को गहराई से पोषण मिलता है। यदि पूरे शरीर की मालिश संभव न हो, तो सिर, पैरों और कानों के पीछे तेल अवश्य लगाएं। इससे तंत्रिका तंत्र सक्रिय होता है।
3. स्वेदन (पसीना लाना)
स्वेदन का अर्थ है शरीर से पसीना निकालना। जब शरीर से पसीने के जरिए विषाक्त तत्व बाहर निकलते हैं, तो वात संतुलन में रहता है। योग, प्राणायाम या हल्की एक्सरसाइज के माध्यम से पसीना लाने का प्रयास करें। इससे ऊर्जा का प्रवाह भी बेहतर होता है।
4. संतुलित आहार
वात दोष को संतुलित करने के लिए आहार में तीन रस—मीठा, खट्टा और लवण (नमकीन)—का होना जरूरी है। भोजन हमेशा गरम-गरम करें और इन तीनों रसों को संतुलित मात्रा में शामिल करें। ठंडा और बासी भोजन वात को बढ़ा सकता है।
5. वेष्टन (गर्म पट्टी बांधना)
वात की वृद्धि होने पर हड्डियों और जोड़ों से जुड़े दर्द की समस्या बढ़ जाती है। ऐसे में दर्द वाले हिस्से पर गर्म पट्टी बांधना लाभकारी होता है। इससे दर्द में राहत मिलती है और वात का शमन होता है।
आयुर्वेद के अनुसार, इन आसान उपायों को दिनचर्या में अपनाकर वात दोष को संतुलित किया जा सकता है और शरीर को स्वस्थ व ऊर्जावान रखा जा सकता है।
Author: Deepak Mittal










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