जन्माष्टमी का त्योहार हिंदुओं के लिए बेहद खास है। यह भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का प्रतीक है, जिसे लोग बड़े ही उत्साह और भक्ति के साथ मनाते हैं। इस दिन आधी रात तक घरों और मंदिरों को सजाया जाता है और भक्त भगवान के जन्म के समय तक भक्ति गीत गाते हुए जागते रहते हैं।
जन्माष्टमी की सबसे खास परंपराओं में से एक है 56 भोग।
56 भोग क्या है और इसका क्या महत्व है?
जन्माष्टमी के दिन भक्त भगवान कृष्ण को 56 तरह के स्वादिष्ट व्यंजन बनाकर अर्पित करते हैं। यह भोग कृष्ण के प्रति उनके प्रेम, भक्ति और कृतज्ञता का प्रतीक माना जाता है। भक्तों का मानना है कि इस भोग को अर्पित करने से उन्हें भगवान का आशीर्वाद मिलता है और उनके जीवन में सुख, समृद्धि और आनंद आता है। यह भोग पूरी शुद्धता के साथ बनाया जाता है और भगवान को अर्पित करने के बाद इसे भक्तों के बीच प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।
56 भोग के पीछे की पौराणिक कथा
56 भोग की परंपरा के पीछे एक दिलचस्प पौराणिक कथा है। कहा जाता है कि जब भगवान कृष्ण छोटे थे, तो वे दिन में आठ बार भोजन करते थे। एक बार जब इंद्रदेव के क्रोध के कारण गोकुल में भारी बारिश हुई, तो भगवान कृष्ण ने गोकुलवासियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर सात दिनों तक उठाए रखा। इस दौरान उन्होंने कुछ भी नहीं खाया। जब बारिश रुकी, तो गोकुलवासियों को यह एहसास हुआ कि कृष्ण ने सात दिनों तक कुछ नहीं खाया, जबकि वह दिन में आठ बार भोजन करते थे। इस तरह सात दिनों के लिए 56 बार भोजन बनता है (8 x 7 = 56)। इसी कारण गोकुलवासियों ने कृष्ण के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने और उन्हें प्रसन्न करने के लिए 56 तरह के व्यंजन बनाकर उन्हें अर्पित किए। तब से ही यह 56 भोग की परंपरा चली आ रही है।
Author: Deepak Mittal










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