योगिक साहित्य के अनुसार हठ योग दो शब्दों ‘ह’ और ‘ठ’ से मिलकर बना है। ‘ह’ (हकार) का अर्थ है सूर्य स्वर या दाहिनी नासिका, जबकि ‘ठ’ (ठकार) का अर्थ है चंद्र स्वर या बाईं नासिका। हठ योग का मूल भाव है सूर्य और चंद्र स्वर का संयोग।
योग परंपरा के मुताबिक, जब इड़ा और पिंगला नाड़ियां, यानी वाम और दक्षिण स्वर, समान रूप से प्रवाहित होने लगते हैं, तब सुषुम्ना नाड़ी का जागरण होता है। इसके निरंतर सक्रिय रहने से शरीर में स्थित सूक्ष्म कुंडलिनी शक्ति जाग्रत होती है। यह शक्ति चक्रों को भेदते हुए सहस्रार तक पहुँचती है और परम शिव से एकत्व प्राप्त करती है।

आध्यात्मिक दृष्टि से, हठ योग को साधक के आत्मा और परमात्मा के मिलन का मार्ग माना जाता है।
Author: Deepak Mittal










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