
मुंगेली- निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत बनाये गये नियम दिनांक- 26 मार्च 2009 से पूरे देश मे लागू हुआ है। इस नियम के अंतर्गत वंचित समूह एवं कमजोर वर्ग के बच्चों को अनिवार्य रूप से शिक्षा देना होता है। परन्तु इस अधिनियम के लागू होने के बाद भी नगर पंचायत सरगांव में इस क़ानून की धज्जियाँ उड़ाई जा रही है जिम्मेदार स्कुल शिक्षा विभाग इस पर कार्य नही कर रहा है।
ज्ञात हो कि विगत 30 वर्षो से तत्कालीन ग्राम पंचायत सरगांव में घुमन्तु देवार जाति जो अनुसूचित जाति वर्ग में आती है निवासरत है जो शुरू से वंचित और अभाव का जीवन जी रही है माना कि पुरानी पीढ़ी को शिक्षा का अवसर नही मिला तो उनका शैक्षणिक व आर्थिक विकास नही हुआ था। परन्तु आज अनिवार्य शिक्षा का अधिकार के लागू होने के बाद भी उनके बच्चे स्कूल की दहलीज पर नही जा पा रहे हैं तो किसी को तो इसकी जिम्मेदारी लेनी होगी ।
वर्तमान में नगर पंचायत सरगांव के वार्ड 13 में निवासरत देवार जाति के बच्चों को सरगांव के शासकीय स्कुलो में प्रवेश देने के लिए स्वयं शिक्षको को उनके घर पर जाकर उन्हें प्रेरित किया जाना चाहिए और उन्हें प्रवेश देकर उनकी नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करते हुए उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना चाहिए। यह सभी स्कूल शिक्षा विभाग का कर्त्तव्य है.
जो निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत बनाये गये नियम के अंतर्गत आता है। विभाग को इस ओर विशेष कदम उठा कर एक ऐसा मिसाल पेश किया जाना चाहिए कि वर्तमान शिक्षा और प्रणाली अपने नाम को चरितार्थ करते हुए ऊंचाई को अग्रसर हो सके किंतु जानकर भी अनजान बने विभाग के चलते शिक्षा का अधिकार अधिनियम सही मायने में सिर्फ कोरे कागज पर नज़र आता है ।
अब ऐसे में प्रश्न ये खड़ा होता है कि असल अशिक्षित कौन है? वो जो नियति के भार, अभावों के नैन बसेरों, और पैरों तले रौंदते व्यवस्था के बावजूद समाज में फैले कचरे को उठाकर साफ करने में लगे है या वो जो डिग्रियों का लिबाज़ पहने पदों पे आसीन उनके अधिकारों को रद्दी की टोकरी में डाल रहे है?
Author: Deepak Mittal









Total Users : 8179947
Total views : 8211222