महिला दिवस एक मज़ाक ,,,,,संगीता तिवारी

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Deepak Mittal

 

फोटो,, वीना दुबे
वीना दुबे

8 मार्च को संपूर्ण विश्व में महिला दिवस मनाया जाता है। सच कहिए कि यह पढ़कर आपको हंसी नहीं आती क्योंकि कोई भी एक दिवस आप बिना महिला के कल्पना करके बता दीजिए क्या आप बिना महिलाओं के इस विश्व की कल्पना कर सकते हैं, नहीं ना तो फिर सिर्फ एक ही दिन 8 मार्च को संपूर्ण विश्व को महिला महिलाओं का ख्याल क्यों आता है ।
चलिए शुरुआत से शुरू करते हैं बताइए सृष्टि की रचना कैसे हुई आप कहेंगे यह कैसा सवाल है यह तो हर कोई जानता है कि आदमि और हवा के मिलन से इस सृष्टि की रचना हुई है आपका कहना बिल्कुल सत्य है किंतु मुझे यह बताइए कि यदि हव्हा, नारी महिला नहीं होती तो क्या इस संसार की रचना संभव थी नहीं ना फिर नारी का सिर्फ एक दिन क्यों?
अब चलिए प्रकृति की ओर चलते हैं सबसे पहले तो यह देखिए जिसने संपूर्ण संसार का बोझ अपने कंधे पर उठा

रखा है वह धरती हमारी मां है जो संपूर्ण विश्व की प्यास बुझाती है गंगा जमुना सरस्वती यह सभी नदियां हमारी मां है । हमको शत्रुओं से बचाने वाली देवी दुर्गा काली जगदंबा है हमारे घरों में सुख शांति समृद्धि लाने वाली देवी मां लक्ष्मी है हमें अक्षर ज्ञान देने वाली मां सरस्वती है यमराज से छीनकर वापस अपने पति को लाने वाली सती भी एक स्त्री अर्थात महिला ही है, कहने का तात्पर्य यह है कि धरती के कण कण में चारों तरफ हर ओर महिलाओं का अस्तित्व व्याप्त है तो फिर हमारा सम्मान हमारे लिए सिर्फ एक दिन क्यों ?
क्योंकि हमारा समाज एक पुरुष प्रधान समाज है इसलिए आप कहेंगे कि मैं अनावश्यक बहस कर रही हूं तो चलिए बताइए कि यदि सिर्फ 8 मार्च एक दिन हम महिलाओं का है तो क्या बाकी के 364 दिन आप बिना महिलाओं के वजूद के इस समाज की कल्पना कर सकते हैं, नहीं ना,? जिस तरह यदि मुर्गा बांग ना दे तो सुबह ही ना हो ठीक उसी तरह यदि प्रत्येक घर में महिला सबसे पहले उठकर सुबह बच्चों और पति को ना जगाए तो वह कभी भी समय पर स्कूल नही जा सकेंगे और ना ही पति ऑफिस जा पाएंगे कहने का मतलब यह है कि चाहे घर हो या सृष्टि सबका आधार दूरी केंद्र बिंदु नारी है बिना उसके 364 दिन तो क्या एक क्षण एक पल की भी कल्पना नहीं की जा सकती यहां तक की बिना नारी के तो घर भी मकान कहलाता है घर को घर नारी ही बनाती है इसलिए मेरी समस्त पुरुष वर्ग से हाथ जोड़कर विनम्र निवेदन है कि वह मात्र एक दिन 8 मार्च को महिला दिवस का नाम देकर और फूलों का गुलदस्ता भेंट कर सम्मान देकर हम महिलाओं का अपमान ना करें बल्कि यदि वे वाकई दिल से महिलाओं का सम्मान करना चाहते हैं तो उन्हें वास्तविक जीवन में प्रतिदिन बराबरी का दर्जा दें घर में ऑफिस में समाज में हर जगह हर वक्त प्रतिदिन उनका सम्मान करें उन्हें अपनी बराबरी का दर्जा दें हर समय उन्हें तुम औरत हो और औरत के समान रहो यह कहकर अपमानित न करें और ना ही समाज में उन्हें दूसरी श्रेणी का दर्जा दें, बस बस मेरी यही सबसे प्रार्थना है, बहुत-बहुत धन्यवाद
यह मेरे अपने विचार हैं मेरा उद्देश्य पुरुष वर्ग के अहम को चोट पहुंचाना नहीं है फिर भी यदि किसी को बुरा लगे तो मैं क्षमा प्रार्थी हूं धन्यवाद ।

 

*(दीपक मित्तल नवभारत टाइम्स 24*7 in प्रधान संपादक रायपुर)*

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Author: Deepak Mittal

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