योगेश राजपूत गरियाबंद –व्यासपीठ से भगवताचार्य बाल कथा व्यास पं. सुरेन्द्र कृष्ण शास्त्री जी महाराज श्री धाम वृन्दावन ने अपने मुखारवृन्द से सुदामा चरित्र के वर्णन किए जाने पर भागवत पंडाल में उपस्थित श्रद्धालु भाव विभोर हो गए। भगवताचार्य ने सुदामा चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि मित्रता हो तो भगवान कृष्ण और सुदामा जैसी करो। भगवान कृष्ण के बाल सखा थे जिनका नाम सुदामा। सुदामा काफी गरीब ब्राम्हण थे। गांव में कथा पूजापाठ कर अपना जीवन यापन करते। एक बार ऐसा हुआ कि परिवार में खाने के लाले पड़ गए। वे अक्सर घर में अपनी कृष्ण से मित्रता की चर्चा करते थे। जब घर में खाने के लाले पड़े गए तो पत्नि ने कहा कि आप तो कृष्ण को अपना मित्र कहते है वे तो राजा है, उनके पास क्यों नहीं जाते।
परन्तु सुदामा गरीब लेकिन स्वाभिमान थे। काफी दिन से पत्नि द्वारा अपनी गरीबी का उलाहवन देती तो एक दिन सुदामा ने कृष्ण से मिलने जाने का निर्णय लिया सुदामा चरित्र के वर्णन में भगवताचार्य ने बताया कि सुदामा 12 गुणों से संपन्न ब्राम्हण थे। सुदामा और कृष्ण बाल सखा थे। चोरी के चार चने ज्यादा खाने से सुदामा को गरीबी देखनी पड़ी। गरीबी में जीते हुए सुदामा कभी भी कृष्ण के पास गए नहीं। परन्तु पत्नि सुशीला के कहने पर जाने को राजी हुए और कहा की मित्र के पास खाली हाथ कैसे जाऊ। तब पत्नि ने घर में रखे थोड़े से चांवल की पोटरी बनाकर दी।
जब सुदामा भगवान के पास द्वारिका पहुंचे तो भगवान ने अपने आंसुओं से सुदामा के चरण धोएं। संकोचवश सुदामा भगवान से कुछ मांगे नहीं, परन्तु भगवान सब समझ गए। इस कथा का रहस्य यही है कि भगवान की दया-कृपा से सब कुछ पावें, परन्तु घमंड न करें सदा विनयभाव एवं झुकने का प्रयास करो। अपने दिन को बना लो सुदामा रूपी जीव, कृष्ण रूपी आनंद के पास गया। कुछ नहीं मांगा। परमात्मा ने दो लोक की संपदा सुदामा रूपी जीव को दे दिया। श्री कृष्ण गरीब सुदामा के साथ अपनी मित्रता को निभाकर दुनिया में मिसाल पेश की।
कृष्ण-सुदामा की मित्रता से सीख लेते हुए हमें भी अपने जीवन में ऐसी ही मित्रता निभानी चाहिए। ताकि हर स्थिति में मित्र को हमारे ऊपर भरोसा बना रहे। भगवान श्री कृष्ण ने सतत् पतितों का उद्धार किया है और असुरों का संहार कर धरती में धर्म की स्थापना की है। आगे भगवताचार्य ने विष्णु सहस्त्रनाम के श्रवण के साथ तुलसी वर्षा किया गया। आज भागवत भगवान की आरती में काफी उमंग, उत्साह में श्रद्धालुओं की काफी भीड़ थी। अंत में भागवत आयोजक परिवार सरस शर्मा, पंकज-अंकिता शर्मा द्वारा आचार्य जी का पूजन कर श्रीफल आदि भेंट किया गया।
Author: Deepak Mittal










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